वो एक शाम
वो एक शाम जो हमने साथ बितायी थी
जब तुमसे सब कुछ कहने की मैंने हिम्मत जुटाई थी
वो एक शाम जो सुबह तक हमारे साथ रही और
मेरे और तुम्हारे "हम" बनने की गवाही थी,
वो एक शाम जब वक़्त को हमने अपने इशारो पे नचाया था
प्यार का मदहोशी भरा एक गीत गया था
वो शाम जो मुझे लगा था की मैं भूल गयी हूँ
वो शाम जो मैंने समझा था की ढल गयी है
वो शाम जो मैंने सोचा था कहीं सो गयी है
वो शाम मुझे कल मिली,
और मुझे मालूम हुआ कि
मेरा भूलना
उस शाम का ढालना
और सोना सब झूठ था
बिलकुल मेरी तरह झूठ,
वो झूठ जो हर सच पर भारी पडे.
जब तुमसे सब कुछ कहने की मैंने हिम्मत जुटाई थी
वो एक शाम जो सुबह तक हमारे साथ रही और
मेरे और तुम्हारे "हम" बनने की गवाही थी,
वो एक शाम जब वक़्त को हमने अपने इशारो पे नचाया था
प्यार का मदहोशी भरा एक गीत गया था
वो शाम जो मुझे लगा था की मैं भूल गयी हूँ
वो शाम जो मैंने समझा था की ढल गयी है
वो शाम जो मैंने सोचा था कहीं सो गयी है
वो शाम मुझे कल मिली,
और मुझे मालूम हुआ कि
मेरा भूलना
उस शाम का ढालना
और सोना सब झूठ था
बिलकुल मेरी तरह झूठ,
वो झूठ जो हर सच पर भारी पडे.

4 Comments:
This one began with a lot of promise but somehow fizzled out by the end...revisit it after a few days and I am sure you would know what I am talking about.
A nice attempt overall...but somehow I feel you could have done better than this.. :) Will wait for more.
wld u like to remove the last line and read it again?
Himanshu and HDWK : Thanks a lot for your suggestions. I gave it some thought but realised with my limited abilities it is not possible to improvise so will leave it like this only.
"Somethings in life never end so we flounder to putting a forced end to it."
Very beautifuly written and here is a rejoinder which is also inspired.
वो शाम ना आप भूले थे ना हम भूले है .....
वो शाम ना तब ढली थी ना आज ढली है ......
ना उस शाम हम झूठ थे ना आज आप झूठ है..
यह बात और है की वो हमारा कल का सच था
और
वो आज के परिवेश में शायद सच नहीं है पर झूठ भी नहीं है................"
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